उसने रामायण पढ़ी होती

हुएन सांगची लाऊ, यही नाम था उसका। पिता उसे सांग कहते थे। जी चाहे तो आप भी इसी नामसे पुकारिये । उसका पिता शिकारी था। रीछ फँसाता, हिरन मारता और फिर उनके चमड़े बेच डालता। यही रोजगार था बाप-दादोंसे उसके घरका ।


एक दिन पिताने उसे एक बड़े पेड़की छायामें बैठा दिया और स्वयं बंदूक लेकर एक ओर जंगलमें चला गया । घरमें न माँ है और न कोई भाई-बहिन । इसलिये सूने घरमें उसका मन लगता नहीं था। मास्टरजीकी बेंतके डरसे वह पाठशाला नहीं जाता। दूसरे लड़के पढ़ने चले जाते हैं। भला, गाँवमें किसके साथ खेले ?


पिताके साथ रोज जंगलमें जाता है। कभी चिड़ियोंको है, कभी खरगोशके पीछे दौड़ता है। झरबेरी और आडू भी खानेको मिल जाते हैं। वह शिकारीका लड़का है। उसे अकेले जंगलमें दौड़ने और खेलनेमें डर नहीं लगता। 

एक दिन पिताके चले जानेपर वह घूम रहा था । एक ओरसे'खों-खों की आवाज आयी। वह देखने दौड़ गया। एक बड़ा सा रीछ कँटीली झाड़ियों में उलझ गया था। बड़े-बड़े बालोंमें काँटे फँसे थे। एक ओरसे काँटे छुड़ाता तो दूसरी ओर उलझ जाते। रीछ घबरा गया था। लड़केको दया आ गयी। वह पास चला गया। उसने काँटे छुड़ाकर रीछको छुटकारा दे दिया।

 रीछ बड़े जोरसे चिल्लाया। लड़केके सामने खड़े होकर देरतक भलभलाता रहा। लड़का डर रहा था, मुझे खा न जाय । भाग भी नहीं सकता था। रीछ जाने क्या व्याख्यान दे रहा था। थोड़ी देरमें रीछ उलटे भाग गया। लड़केकी जानमें जान आयी।


रीछ किसीपर चिढ़ जाय तो बड़ा भयानक शत्रु होता है, वह पेड़पर भी चढ़ जाता है। लेकिन किसीपर प्रसन्न हो जाय तो मित्र भी बहुत अच्छा होता है। अपनेपर उपकार करनेवालेका उपकार वह भूलता नहीं है। जो लोग दूसरे प्राणियॉपर दया करते हैं, उन्हें उस दया और उपकारका फल भी मिलता है। संसारके बहुत से प्राणी मनुष्यके उपकारका बड़ा सुन्दर बदला उपकार करके चुकाते हैं। रीछकी भाषा लड़का नहीं समझता था। किंतु रीछने उससे कहा था- मैं तुम्हारा मित्र हूँ। मैं तुम्हारे लिये अभी मीठे फल लेकर आता हूँ।


लड़का वहाँसे बहुत दूर भाग जाना चाहता था। वह दौड़ा जा रहा था। वह कुछ ही दूर जा पाया था कि रीछ फिर आ गया। अबकी बार वह कई सुन्दर-सुन्दर फल लाया था। उसने लड़केके हाथोंमें फल दे दिये। लड़केने खाकर देखा कि बहुत मीठे हैं वे फल ।

लड़के और रीछकी दोस्ती हो गयी। इस मित्रतासे लड़केका बाप बहुत प्रसन्न था। रीछ लड़केको रोज मीठे-मीठे फल लाकर देता था। लड़का अपने पिताको भी वे फल देता था। एक दिन लड़केने जंगलमें आते ही देखा कि उसके मित्र रीछकी आँखें दुखनी आ गयी हैं। वह एक पेड़के तनेसे लगकर बैठा है और 'हूँ' करके रो रहा है। लड़केको हँसी आ गयी । वह ताली बजाकर हँसने लगा। रीछको आया गुस्सा और उसने लड़केकी नाक नोच खायी। लड़केकी यह दुर्दशा क्यों होती, यदि उसने रामायण पढ़ी होती। यदि उसने रामायणकी शिक्षा ली होती तो उसे पता होता कि

 जे न मित्र दुख होहिं दुखारी।

 तिन्हहि बिलोकत पातक भारी ॥

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